श्री हुणेश्वर-घण्डियाल-भैरव देवता मन्दिर सेवा समिति दांणियां धाम,ग्राम सभा मान्दरा बासर; पो०-केपार्स बासर जिला -टिहरी गढ़वाल (उत्तराखण्ड)

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Thursday, April 28, 2016

कुञ्ज बिहारी अष्टक

य: स्तूयते श्रुतिगणैर्निपुणैरजस्रं, सम्पूज्यते क्रतुगतै: प्रणतै: क्रियाभि:।
तं सर्वकर्मफ़लदं निजसेवकानां, श्रीमद्‍ विहारिचरणं शरणं प्रपद्ये॥१॥
यं मानसे सुमतयो यतयो निधाय, सद्यो जहु: सहृदया हृदयान्धकारम्।
तं चन्द्रमण्डल-नखावलि-दीप्यमानं, श्री मद्‍ विहारिचरणं शरणं प्रपद्ये॥२॥
येन क्षणेन समकारि विपद्वियोगो, ध्यानास्पदं सुगमितेन नुतेन विज्ञै:।
तं तापवारण-निवारण-सांकुशांकं ,श्री मद्‍ विहारिचरणं शरणं प्रपद्ये॥३॥
यस्मै विधाय विधिना विधिनारदाद्या:, पूजां विवेकवरदां वरदास्यभावा:।
तं दाक्षलक्षण-विलक्षण-लक्षणाढ्यं, श्री मद्‍ विहारिचरणं शरणं प्रपद्ये॥४॥
यस्मात् सुखैकसदनान्मदनारिमुख्या:, सिद्धि समीयुरतुलां सकलांगशोभाम्।
तं शुद्धबुद्धि-शुभवृद्धि-समृद्धि-हेतुं, श्री मद्‍ विहारिचरणं शरणं प्रपद्ये॥५॥
यस्य प्रपन्नवरदस्य प्रसादत: स्यात्, तापत्रयापहरणं शरणं गतानाम्।
तं नीलनीरजनिभं जनिभंजनाय, श्री मद्‍ विहारिचरणं शरणं प्रपद्ये॥॥६॥
यस्मिन् मनो विनिहितं भवति प्रसन्नं, खिन्नं कदिन्द्रियगणैरपि यद्विष्ण्णम्।
तं वास्तव-स्तव-निरस्त-समस्त दुखं, श्री मद्‍ विहारिचरणं शरणं प्रपद्ये॥७॥
हे कृष्णपाद! शमिताति-विषादभक्त-वांछा-प्रदामर-महीरूह-पंचशाख।
संसार-सागर-समुत्तरणे वहित्र, हे चिह्न-चित्रितचरित्र नमो नमस्ते॥८॥
इदं विष्णो: पादाष्टकमतिविशादाभिशमनम्, प्रणीतं यत्प्रेरणा सुकवि-जगदीशेन विदुषा।
पठेदयो वा भक्तयाऽच्युति-चरण-चेता: स मनुजो, भवे भुक्त्वा भोगानभिसरति चान्ते हरिपदम्॥९॥

Sunday, April 24, 2016

श्री बाँके बिहारी तेरी आरती गांऊं

श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ

श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ ,
कुन्ज बिहारी  तेरी आरती गाऊँ ।
आरती गाऊं प्यारे तुमको रिझाऊं,
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ

मोर मुकुट प्रभु  शीश पे सोहे।
प्यारी बंसी मेरो मन मोहे।
देख छवि बलिहारी मैं जाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ ॥

चरणों से निकली गंगा प्यारी,
जिसने सारी दुनिया तारी।
मैं उन चरणों के दर्शन पाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ ॥

दास अनाथ के नाथ आप हो।
दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो।
हरी चरणों में शीश झुकाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ ॥

श्री हरीदास के प्यारे तुम हो।
मेरे मोहन जीवन धन हो।
देख युगल छवि बलि बलि जाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ ॥
आरती गाउँ प्यारे तुझको रिझाऊँ ।

हे गिरिधर तेरी आरती गाऊँ ।
आरती गाउँ प्यारे तुझको रिझाऊँ ।
कुंज बिहारी तेरी आरती गाउँ ।
श्याम सुन्दर तेरी आरती गाउँ ।
श्री बांके  बिहारी तेरी आरती गाउँ ।
श्री मदन गोपाल तेरी आरती गाउँ ।

Friday, April 22, 2016

आरती: ॐ जय लक्ष्मी माता


ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
तुम को निस दिन सेवत, मैयाजी को निस दिन सेवत

हर विष्णु विधाता .
ॐ जय लक्ष्मी माता ..

उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता
ओ मैया तुम ही जग माता .
सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता
ॐ जय लक्ष्मी माता ..

दुर्गा रूप निरन्जनि, सुख सम्पति दाता
ओ मैया सुख सम्पति दाता .
जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता
ॐ जय लक्ष्मी माता ..

तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता
ओ मैया तुम ही शुभ दाता .
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की दाता
ॐ जय लक्ष्मी माता ..

जिस घर तुम रहती तहँ सब सदगुण आता
ओ मैया सब सदगुण आता .
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता
ॐ जय लक्ष्मी माता ..

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता
ओ मैया वस्त्र न कोई पाता .
खान पान का वैभव, सब तुम से आता
ॐ जय लक्ष्मी माता ..

शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता
ओ मैया क्षीरोदधि जाता .
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता
ॐ जय लक्ष्मी माता ..

महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता
ओ मैया जो कोई जन गाता .
उर आनंद समाता, पाप उतर जाता
ॐ जय लक्ष्मी माता ..


आरती जय शिव ॐकारा

श्री शिवजी की आरती
जय शिव ओंकारा, मन भज शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धाङ्गी धारा॥ 
ॐ हर हर हर महादेव 
एकानन, चतुरानन, पञ्चानन राजे।
हंसासन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥ 
ॐ हर हर हर महादेव  
दो भुज, चार चतुर्भुज, दशभुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखते, त्रिभुवन मन मोहे॥ 
ॐ हर हर हर महादेव  
अक्षमाला, वनमाला, मुण्डमाला धारी।
चन्दन, मृगमद सोहे, भाले शशि धारी  
ॐ हर हर हर महादेव 
श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे।  
सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे॥ 
ॐ हर हर हर महादेव 
कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूल धर्ता ।
सुखकर्ता दुःखहर्ता, जगपालन कर्ता  
ॐ हर हर हर महादेव 
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये, ये तीनों एका॥ 
ॐ हर हर हर महादेव
त्रिगुण शिवजी की आरती, जो कोई जन  गावे 
कहत शिवानन्द स्वामी, मन वांछित फल पावे  
ॐ हर हर हरहर महादेव

ॐ जय जगदीश हरे

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश…
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश…
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश…
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश…
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश…
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश…
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
करुणा हाथ बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश…
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश…

Wednesday, April 20, 2016

देवताओं के मनमोहक दृश्य


किस माला से करें जाप


अन्य धर्मों की तरह सनातन (हिन्दू) धर्म में भी जप के लिए माला का प्रयोग होता है। क्योंकि किसी भी जप में संख्या का बहुत महत्त्व होता है। निश्चित संख्या में जप करने के लिए माला का प्रयोग करते हैं। माला फेरने से एकाग्रता भी बनी रहती है। वैसे तो माला के अन्य बहुत से प्रयोग हैं, लेकिन मैं यहां जप संबंधी बातें बताना चाहता हूँ। किसी देवी-देवता के मंत्र का जप करने के लिए एक निश्चित संख्या होती है। उस संख्या का १० प्रतिशत हवन, हवन का १० प्रतिशत तर्पण, तर्पण का १० प्रतिशत मार्जन, मार्जन की १० प्रतिशत संख्या में ब्राह्मण भोजन करना होता है। इन सभी संख्यों का निर्धारण बिना माना के संभव नहीं। माला में १०८ दाने (मनके) होने चाहिए। ५४, २७ (इत्यादि) मनको की माला से भी जप किया जाता है। साधना विशेष के लिए मनकों की संख्या का विचार है। दो मनकों के बीच डोरी में गांठ होना जरूर है, आमतौर से गांठ की माला अच्छी होती है। अर्थात् डोरी में मनके पिरोते समय साधक हर मनके के बाद गांठ लगाए। मनके पिरोते समय अपने इष्टदेव का जप करते रहना चाहिए। सफेद डोरी शान्ति, सिद्धि आदि शुभ कार्यों के लिए प्रयोग करनी चाहिए। लाल धागे से वशीकरण आदि तथा काले धागे से पिरोई गई माला द्वारा मारण कर्म किये जाते हैं। मनके किसी भी चीज (प्लास्टिक इत्यादि छोड़कर) के हों मगर खंडित नहीं होने चाहिए। रुद्राक्ष की माला भगवान् शंकर को प्रिय है और इसे सभी देवी देवताओं की पूजा आराधना प्रयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष पर जप करने से अनन्त गुना (अन्य सभी मालाओं की तुलना में बहुत अधिक) फल मिलता है। इसे धारण करना भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जिस माला को धारण करते हैं उस पर जप नहीं करते लेकिन उसी जाति (किस्म) कि दूसरी माला पर जप कर सकते हैं। जप करते समय माला गोमुखी या किसी वस्त्र से ढकी होनी चाहिए अन्यथा जप का फल चोरी हो जाता है। जप के बाद जप-स्थान की मिट्टी या जल मस्तक पर लगा लेनी चाहिए अन्यथा जप का फल इन्द्र को चला जाता है। प्रातःकाल जप के समय माला नाभी के समीप होनी चाहिए, दोपहर में हृदय और शाम को मस्तक के सामने। जप में तर्जनी अंगुली का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए। इसलिए गोमुखी के बड़े छेद से हाथ अन्दर डाल कर छोटे छेद से तर्जनी को बाहर निकलकर जप करना चाहिए। अभिचार कर्म में तर्जनी का प्रयोग होता है। जप में नाखून का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए। सुमेरु के अगले दाने से जप आरम्भ करे, माला को मध्यमा अंगुली के मघ्य पोर पर रख कर दानों को अंगूठे की सहायता से अपनी ओर गिराए। सुमेरु को नहीं लांघना चाहिए। यदि एक माला से अधिक जप करना हो तो, सुमेरु तक पहुंच कर अंतिम दाने को पकड़ कर, माला पलटी कर के, माला की उल्टी दिशा में, लेकिन पहले की तरह ही जप करना चाहिए। देवता विषेश के लिए माला का चयन करना चाहिए- हाथी दांत की माला गणेशजी की साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। लाल चंदन की माला गणेशजी व देवी साधना के लिए उत्तम है। तुलसी की माला से वैष्णव मत की साधना होती है (विष्णु, राम व कृष्ण)। मूंगे की माला से लक्ष्मी जी की आराधना होती है। पुष्टि कर्म के लिए भी मूंगे की माला श्रेष्ठ होती है। मोती की माला वशीकरण के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। पुत्र जीवा की माला का प्रयोग संतान प्राप्ति के लिए करते हैं। कमल गट्टे की माला लक्ष्मीजी की आराधना के लिए अति उत्तम है। कुश-मूल की माला का प्रयोग पाप-नाश व दोष-मुक्ति के लिये होता है। हल्दी की माला से बगलामुखी की साधना होती है। स्फटिक की माला शान्ति कर्म और ज्ञान प्राप्ति; माँ सरस्वती व भैरवी की आराधना के लिए श्रेष्ठ होती है। चाँदी की माला राजसिक प्रयोजन तथा आपदा से मुक्ति में विशेष प्रभावकरी होती है। जप से पूर्व निम्नलिखित मंत्र से माला की वन्दना करनी चाहिए– (साधना या देवता विशेष के लिए अलग-अलग माला-वन्दना होती है) ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणी। चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥ ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे। जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥

श्री राम अमृत वाणी,


श्री राम          

राम-कृपा अवतरण

परम कृपा सुरूप है, परम प्रभु श्री राम ।
जन पावन परमात्मा, परम पुरुष सुख धाम ।। १ ।।
सुखदा है शुभा कृपा, शक्ति शान्ति स्वरूप ।
है ज्ञान आनन्द मयी, राम कृपा अनूप ।। २ ।।
परम पुण्य प्रतीक है, परम ईश का नाम ।
तारक मंत्र शक्ति घर, बीजाक्षर है राम ।। ३ ।।
साधक साधन साधिए, समझ सकल शुभ सार ।
वाचक वाच्य एक है, निश्चित धार विचार ।। ४ ।।
मंत्रमय ही मानिए, इष्ट देव भगवान् ।
देवालय है राम का, राम शब्द गुण खान ।। ५ ।।
राम नाम आराधिए, भीतर भर ये भाव ।
देव दया अवतरण का, धार चौगुना चाव ।। ६ ।।
मन्त्र धारणा यों कर, विधि से ले कर नाम ।
जपिए निश्चय अचल से, शक्ति धाम श्री राम ।। ७ ।।
यथा वृक्ष भी बीज से, जल रज ऋतु संयोग ।
पा कर, विकसे क्रम से, त्यों मन्त्र से योग ।। ८ ।।
यथा शक्ति परमाणु में, विद्युत् कोष समान ।
है मन्त्र त्यों शक्तिमय, ऐसा रखिए ध्यान ।। ९ ।।
ध्रुव धारणा धार यह, राधिए मन्त्र निधान ।
हरि-कृपा अवतरण का, पूर्ण रखिए ज्ञान ।। १० ।।
आता खिड़की द्वार से, पवन तेज का पूर ।
है कृपा त्यों आ रही, करती दुर्गुण दूर ।। ११ ।।
बटन दबाने से यथा, आती बिजली धार ।
नाम जाप प्रभाव से, त्यों कृपा अवतार ।।१२ ।।
खोलते ही जल नल ज्यों, बहता वारि बहाव ।
जप से कृपा अवतरित हो, तथा सजग कर भाव ।। १३ ।।
राम शब्द को ध्याइये, मन्त्र तारक मान ।
स्वशक्ति सत्ता जग करे, उपरि चक्र को यान ।। १४ ।।
दशम द्वार से हो तभी, राम कृपा अवतार ।
ज्ञान शक्ति आनन्द सह, साम शक्ति संचार ।। १५ ।।
देव दया स्वशक्ति का, सहस्र कमल में मिलाप ।
हो सत्पुरुष संयोग से, सर्व नष्ट हों पाप ।। १६ ।।


नमस्कार सप्तक

करता हूं मैं वन्दना, नत शिर बारम्बार ।
तुझे देव परमात्मन्, मंगल शिव शुभकार ।। १ ।।
अंजलि पर मस्तक किये, विनय भक्ति के साथ ।
नमस्कार मेरा तुझे, होवे जग के नाथ ।। २ ।।
दोनों कर को जोड़ कर, मस्तक घुटने टेक ।
तुझ को हो प्रणाम मम, शत शत कोटि अनेक ।। ३ ।।
पाप-हरण मंगल-करण, चरण शरण का ध्यान ।
धार करूँ प्रणाम मैं, तुझ को शक्ति-निधान ।। ४ ।।
भक्ति-भाव शुभ-भावना, मन में भर भरपूर ।
श्रद्धा से तुझ को नमूँ, मेरे राम हजूर ।। ५ ।।
ज्योतिर्मय जगदीश हे, तेजोमय अपार ।
परम पुरुष पावन परम, तुझ को हो नमस्कार ।। ६ ।।
सत्यज्ञान आनन्द के, परम धाम श्री राम ।
पुलकित हो मेरा तुझे होवे बहु प्रणाम ।। ७ ।।

प्रात: पाठ

परमात्मा श्री राम परम सत्य, प्रकाश रूप,
परम ज्ञानानन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान्,
एकैवाद्वितीय परमेश्वर, परम पुरुष,
दयालु देवाधिदेव है, उसको बार-बार
नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार ।।


अमृत वाणी

रामामृत पद पावन वाणी,
राम नाम धुन सुधा समानी ।
पावन पाठ राम गुण ग्राम,
राम राम जप राम ही राम ।।१ ।।
परम सत्य परम विज्ञान,
ज्योति-स्वरूप राम भगवान् ।
परमानन्द, सर्वशक्तिमान्,
राम परम है राम महान् ।।२ ।।
अमृत वाणी नाम उच्चारण,
राम राम सुखसिद्धि-कारण ।
अमृत-वाणी अमृत श्री नाम,
राम राम मुद मंगल-धाम ।।३ ।।
अमृतरूप राम-गुण गान,
अमृत-कथन राम व्याख्यान ।
अमृत-वचन राम की चर्चा,
सुधा सम गीत राम की अर्चा ।।४ ।।
अमृत मनन राम का जाप,
राम राम प्रभु राम अलाप ।
अमृत चिन्तन राम का ध्यान,
राम शब्द में शुचि समाधान ।।५ ।।
अमृत रसना वही कहावे,
राम राम जहाँ नाम सुहावे ।
अमृत कर्म नाम कमाई,
राम राम परम सुखदाई ।।६ ।।
अमृत राम नाम जो ही ध्यावे,
अमृत पद सो ही जन पावे ।
राम नाम अमृत-रस सार,
देता परम आनन्द अपार ।।७ ।।

राम राम जप हे मना,
अमृत वाणी मान ।
राम नाम में राम को,
सदा विराजित जान ।।८ ।।

राम नाम मुद मंगलकारी,
विध्न हरे सब पातक हारी ।
राम नाम शुभ शकुन महान्,
स्वस्ति शान्ति शिवकर कल्याण ।।९ ।।
राम राम श्री राम विचार,
मानिए उत्तम मंगलाचार ।
राम राम मन मुख से गाना,
मानो मधुर मनोरथ पाना ।।१० ।।
राम नाम जो जन मन लावे,
उस में शुभ सभी बस जावे ।
जहां हो राम नाम धुन-नाद,
भागें वहां से विषम विषाद ।।११ ।।
राम नाम मन-तप्त बुझावे,
सुधा रस सींच शांति ले आवे ।
राम राम जपिए कर भाव,
सुविधा सुविधि बने बनाव ।।१२ ।।

राम नाम सिमरो सदा,
अतिशय मंगल मूल ।
विषम-विकट संकट हरण,
कारक सब अनुकूल ।।१३ ।।

जपना राम राम है सुकृत,
राम नाम है नाशक दुष्कृत ।
सिमरे राम राम ही जो जन,
उसका हो शुचितर तन मन ।।१४ ।।
जिसमें राम नाम शुभ जागे,
उस के पाप ताप सब भागे ।
मन से राम नाम जो उच्चारे,
उस के भागें भ्रम भय सारे ।।१५ ।।
जिस में बस जाय राम सुनाम,
होवे वह जन पूर्णकाम ।
चित्त में राम राम जो सिमरे,
निश्चय भव सागर से तरे ।।१६ ।।
राम सिमरन होवे सहाई,
राम सिमरन है सुखदाई ।
राम सिमरन सब से ऊंचा,
राम शक्ति सुख ज्ञान समूचा ।।१७ ।।

राम राम ही सिमर मन,
राम राम श्री राम ।
राम राम श्री राम भज,
राम राम हरि-नाम ।।१८ ।।

मात-पिता बान्धव सुत दारा,
धन जन साजन सखा प्यारा ।
अन्त काल दे सके न सहारा,
राम नाम तेरा तारन हारा ।।१९ ।।
सिमरन राम नाम है संगी,
सखा स्नेही सुहृद् शुभ अंगी ।
युग युग का है राम सहेला,
राम भक्त नहीं रहे अकेला ।।२० ।।
निर्जन वन विपद् हो घोर,
निबड़ निशा तम सब ओर ।
जोत जब राम नाम की जगे,
संकट सर्व सहज से भगे ।।२१ ।।
बाधा बड़ी विषम जब आवे,
वैर विरोध विघ्न बढ़ जावे ।
राम नाम जपिए सुख दाता,
सच्चा साथी जो हितकर त्राता ।।२२ ।
मन जब धैर्य  को नहीं पावे,
कुचिन्ता चित्त को चूर बनावे ।
राम नाम जपे चिन्ता चूरक,
चिन्तामणि चित्त चिन्तन पूरक ।।२३ ।।
शोक सागर हो उमड़ा आता,
अति दुःख में मन घबराता ।
भजिए राम राम बहु बार,
जन का करता बेड़ा पार ।।२४ ।।
कड़ी घड़ी कठिनतर काल,
कष्ट कठोर हो क्लेश कराल ।
राम राम जपिए प्रतिपाल,
सुख दाता प्रभु दीनदयाल ।।२५ ।।
घटना घोर घटे जिस बेर,
दुर्जन दुखड़े लेवें घेर ।
जपिए राम नाम बिन देर,
रखिए राम राम शुभ टेर ।।२६ ।।
राम नाम हो सदा सहायक,
राम नाम सर्व सुखदायक ।
राम राम प्रभु राम का टेक,
शरण शान्ति आश्रय है एक ।।२७ ।।
पूंजी राम नाम की पाइये,
पाथेय साथ नाम ले जाइये ।
नाशे जन्म मरण का खटका,
रहे राम भक्त नहीं अटका ।।२८ ।।

राम राम श्री राम है,
तीन लोक का नाथ ।
परम पुरुष पावन प्रभु,
सदा का संगी साथ ।।२९ ।।

यज्ञ तप ध्यान योग ही त्याग,
बन कुटी वास अति वैराग ।
राम नाम बिना नीरस फोक,
राम राम जप तरिए लोक ।।३० ।।
राम जाप सब संयम साधन,
राम जाप है कर्म आराधन ।
राम जाप है परम अभ्यास,
सिमरो राम नाम 'सुख-रास' ।।३१ ।।
राम जाप कही ऊँची करणी,
बाधा विध्न बहु दुःख हरणी ।
राम राम महा-मन्त्र जपना,
है सुव्रत नेम तप तपना ।।३२ ।।
राम जाप है सरल समाधि,
हरे सब आधि व्याधि उपाधि ।
ऋद्धि सिद्धि और नव निधान,
दाता राम है सब सुख खान ।।३३ ।
राम राम चिन्तन सुविचार,
राम राम जप निश्चय धार ।
राम राम श्री राम ध्याना,
है परम पद अमृत पाना ।।३४ ।।

राम राम श्री राम हरि,
सहज परम है योग ।
राम राम श्री राम जप,
दाता अमृत भोग ।।३५ ।।

नाम चिन्तामणि रत्न अमोल,
राम नाम महिमा अनमोल ।
अतुल प्रभाव अति प्रताप,
राम नाम कहा तारक जाप ।।३६ ।।
बीज अक्षर महा-शक्ति-कोष,
राम राम जप शुभ सन्तोष ।
राम राम श्री राम राम मंत्र,
तन्त्र बीज परात् पर यन्त्र ।।३७ ।।
बीजाक्षर पद पद्म प्रकाशे,
राम राम जप दोष विनाशे ।
कुँडलिनी बोधे शुष्मणा खोले,
राम मंत्र अमृत रस घोले ।।३८ ।।
उपजे नाद सहज बहु भांत,
अजपा जाप भीतर हो शान्त ।
राम राम पद शक्ति जगावे,
राम राम धुन जभी रमावे ।।३९ ।।
राम नाम जब जगे अभंग,
चेतन भाव जगे सुख-संग ।
ग्रन्थी अविद्या टूटे भारी,
राम लीला की खिले फुलवारी ।।४० ।।

पतित पावन परम पाठ,
राम राम जप याग ।
सफल सिद्धि कर साधना,
राम नाम अनुराग ।।४१ ।।

तीन लोक का समझिए सार,
राम नाम सब ही सुखकार ।
राम नाम की बहुत बड़ाई,
वेद पुराण मुनि जन गाई ।।४२ ।।
यति सती साधु-संत सयाने,
राम नाम निश दिन बखाने ।
तापस योगी सिद्ध ऋषिवर,
जपते राम राम सब सुखकर ।।४३ ।।
भावना भक्ति भरे भजनीक,
भजते राम नाम रमणीक ।
भजते भक्त भाव भरपूर,
भ्रम भय भेद-भाव से दूर ।।४४ ।।
पूर्ण पंडित पुरुष प्रधान,
पावन परम पाठ ही मान ।
करते राम राम जप ध्यान,
सुनते राम अनाहद तान ।।४५ ।।
इस में सुरति सुर रमाते,
राम राम स्वर साध समाते ।
देव देवीगण दैव विधाता,
राम राम भजते गणत्राता ।।४६ ।।
राम राम सुगुणी जन गाते,
स्वर संगीत से राम रिझाते ।
कीर्तन कथा करते विद्वान,
सार सरस संग साधनवान् ।।४७ ।।

मोहक मंत्र अति मधुर,
राम राम जप ध्यान ।
होता तीनों लोक में,
राम नाम गुण गान ।।४८ ।।

मिथ्या मन-कल्पित मत-जाल,
मिथ्या है मोह कुमद बैताल ।
मिथ्या मन मुखिया मनोराज,
सच्चा है राम नाम जप काज ।।४९ ।।
मिथ्या है वाद विवाद विरोध,
मिथ्या है वैर निंदा हठ क्रोध ।
मिथ्या द्रोह दुर्गुण दुःख खान,
राम नाम जप सत्य निधान ।।५० ।।
सत्य मूलक है रचना सारी,
सर्व सत्य प्रभु राम पसारी ।
बीज से तरु मकड़ी से तार,
हुआ त्यों राम से जग विस्तार ।।५१ ।।
विश्व वृक्ष का राम है मूल,
उस को तू प्राणी कभी न भूल ।
साँस साँस से सिमर सुजान,
राम राम प्रभु राम महान् ।।५२ ।।
लय उत्पत्ति पालना रूप,
शक्ति चेतना आनंद स्वरूप ।
आदि अन्त और मध्य है राम,
अशरण शरण है राम विश्राम ।।५३ ।।

राम नाम जप भाव से,
मेरे अपने आप ।
परम पुरुष पालक प्रभु,
हर्ता पाप त्रिताप ।।५४ ।।

राम नाम बिना वृथा विहार,
धन धान्य सुख भोग पसार ।
वृथा है सब सम्पद् सम्मान,
होवे तन यथा रहित प्राण ।।५५ ।।
नाम बिना सब नीरस स्वाद,
ज्यों हो स्वर बिना राग विषाद ।
नाम बिना नहीं सजे सिंगार,
राम नाम है सब रस सार ।।५६ ।।
जगत् का जीवन जानो राम,
जग की ज्योति जाज्वल्यमान ।
राम नाम बिना मोहिनी माया,
जीवन-हीन यथा तन छाया ।।५७ ।।
सूना समझिए सब संसार,
जहां नहीं राम नाम संचार ।
सूना जानिए ज्ञान विवेक,
जिस में राम नाम नहीं एक ।।५८ ।।
सूने ग्रंथ पन्थ मत पोथे,
बने जो राम नाम बिन थोथे ।
राम नाम बिन वाद विचार,
भारी भ्रम का करे प्रचार ।।५९ ।।

राम नाम दीपक बिना,
जन-मन में अन्धेर ।
रहे, इस से हे मम मन,
नाम सुमाला फेर ।।६० ।।

राम राम भज कर श्री राम,
करिए नित्य ही उत्तम काम ।
जितने कर्तव्य कर्म कलाप,
करिए राम राम कर जाप ।।६१ ।।
करिए गमनागम के काल,
राम जाप जो करता निहाल ।
सोते जगते सब दिन याम,
जपिए राम राम अभिराम ।।६२ ।।
जपते राम नाम महा माला,
लगता नरक द्वार पै ताला ।
जपते राम राम जप पाठ,
जलते कर्मबन्ध यथा काठ ।।६३ ।।
तान जब राम नाम की टूटे,
भांडा भरा अभाग्य भय फूटे ।
मनका है राम नाम का ऐसा,
चिन्ता-मणि पारस-मणि जैसा ।।६४ ।।
राम नाम सुधा-रस सागर,
राम नाम ज्ञान गुण-आगर ।
राम नाम श्री राम महाराज,
भव-सिन्धु में है अतुल जहाज ।।६५ ।।
राम नाम सब तीर्थ स्थान,
राम राम जप परम स्नान ।
धो कर पाप-ताप सब धूल,
कर दे भय-भ्रम को उन्मूल ।।६६ ।।
राम जाप रवि-तेज समान,
महा मोह-तम हरे अज्ञान ।
राम जाप दे आनन्द महान्,
मिले उसे जिसे दे भगवान् ।।६७ ।।

राम नाम को सिमरिये,
राम राम एक तार ।
परम पाठ पावन परम,
पतित अधम दे तार ।।६८ ।।

माँगूं मैं राम-कृपा दिन रात,
राम-कृपा हरे सब उत्पात ।
राम-कृपा लेवे अन्त सम्हाल,
राम प्रभु है जन प्रतिपाल ।।६९ ।।
राम-कृपा है उच्चतर योग,
राम-कृपा है शुभ संयोग ।
राम-कृपा सब साधन-मर्म,
राम-कृपा संयम सत्य धर्म ।।७० ।।
राम नाम को मन में बसाना,
सुपथ राम-कृपा का है पाना ।
मन में राम-धुन जब फिरे,
राम-कृपा तब ही अवतरे ।।७१ ।।
रहूँ, मैं नाम में हो कर लीन,
जैसे जल में हो मीन अदीन ।
राम-कृपा भरपूर मैं पाऊँ,
परम प्रभु को भीतर लाऊँ ।।७२ ।।
भक्ति-भाव से भक्त सुजान,
भजते राम-कृपा का निधान ।
राम-कृपा उस जन में आवे,
जिस में आप ही राम बसावे ।।७३ ।।
कृपा-प्रसाद है राम की देनी,
काल-व्याल जंजाल हर लेनी ।
कृपा-प्रसाद सुधा-सुख-स्वाद,
राम नाम दे रहित विवाद ।।७४ ।।
प्रभु-प्रसाद शिव शान्ति दाता,
ब्रह्म-धाम में आप पहुँचाता ।
प्रभु-प्रसाद पावे वह प्राणी,
राम राम जपे अमृत वाणी ।।७५ ।।
औषध राम नाम की खाइये,
मृत्यु जन्म के रोग मिटाइये ।
राम नाम अमृत रस-पान,
देता अमल अचल निर्वाण ।।७६ ।।

राम राम धुन गूँज से,
भव भय जाते भाग ।
राम नाम धुन ध्यान से,
सब शुभ जाते जाग ।।७७ ।।

माँगूं मैं राम नाम महादान,
करता निर्धन का कल्याण ।
देव द्वार पर जन्म का भूखा,
भक्ति प्रेम अनुराग से रूखा ।।७८ ।।
'पर हूँ तेरा' -यह लिये टेर,
चरण पड़े की रखियो मेर ।
अपना आप विरद विचार,
दीजिए भगवन् ! नाम प्यार ।।७९ ।।
राम नाम ने वे भी तारे,
जो थे अधर्मी अधम हत्यारे ।
कपटी कुटिल कुकर्मी अनेक,
तर गये राम नाम ले एक ।।८० ।।
तर गये धृति धारणा हीन,
धर्म-कर्म में जन अति दीन ।
राम राम श्री राम जप जाप,
हुए अतुल विमल अपाप ।।८१ ।।
राम नाम मन मुख में बोले,
राम नाम भीतर पट खोले ।
राम नाम से कमल विकास,
होवें सब साधन सुख-रास ।।८२ ।।
राम नाम घट भीतर बसे,
साँस साँस नस नस से रसे ।
सपने में भी न बिसरे नाम,
राम राम श्री राम राम राम ।।८३ ।।

राम नाम के मेल से,
सध जाते सब काम ।
देव-देव देवे यदा,
दान महा सुख धाम ।।८४ ।।

अहो ! मैं राम नाम धन पाया,
कान में राम नाम जब आया ।
मुख से राम नाम जब गाया,
मन से राम नाम जब ध्याया ।।८५ ।।
पा कर राम नाम धन-राशी,
घोर अविद्या विपद् विनाशी ।
बढ़ा जब राम प्रेम का पूर,
संकट संशय हो गये दूर ।।८६ ।।
राम नाम जो जपे एक बेर,
उस के भीतर कोष कुबेर ।
दीन दुखिया दरिद्र कंगाल,
राम राम जप होवे निहाल ।।८७ ।।
हृदय राम नाम से भरिए,
संचय राम नाम धन करिए ।
घट में नाम मूर्ति धरिए,
पूजा अन्तर्मुख हो करिए ।।८८ ।।
आँखें मूँद के सुनिए सितार,
राम राम सुमधुर झंकार ।
उस में मन का मेल मिलाओ,
राम राम सुर में ही समाओ ।।८९ ।।
जपूँ मैं राम राम प्रभु राम,
ध्याऊँ मैं राम राम हरे राम ।
सिमरूँ मैं राम राम प्रभु राम,
गाऊँ मैं राम राम श्री राम ।।९० ।।
अमृत वाणी का नित्य गाना,
राम राम मन बीच रमाना ।
देता संकट विपद् निवार,
करता शुभ श्री मंगलाचार ।।९१ ।।

राम नाम जप पाठ से,
हो अमृत संचार ।
राम-धाम में प्रीति हो,
सुगुण-गण का विस्तार ।।९२ ।।

तारक मंत्र राम है,
जिस का सुफल अपार ।
इस मंत्र के जाप से,
निश्चय बने निस्तार ।।९३ ।।

-- इति --


धुन

१. बोलो राम, बोलो राम, बोलो राम राम राम ।
२. श्री राम, श्री राम, श्री राम राम राम ।
३. जय जय राम, जय जय राम, जय जय राम राम राम ।
४. जय राम जय राम, जय जय राम,
राम राम राम राम, जय जय राम ।
५. पतित पावन नाम, भज ले राम राम राम ।
भज ले राम राम राम, भज ले राम राम राम ।।
६. अशरण शरण शान्ति के धाम, मुझे भरोसा तेरा राम ।
मुझे भरोसा तेरा राम, मुझे भरोसा तेरा राम ।।
७. रामाय नमः श्री रामाय नमः,
रामाय नमः श्री रामाय नमः ।
८. अहं भजामि रामं, सत्यं शिवं मंगलम् ।
सत्यं शिवं मंगलं, सत्यं शिवं मगलम् ।।

वृद्धि-आस्तिक भाव की, शुभ मंगल संचार ।
अभ्युदय सद्धर्म का, राम नाम विस्तार ।। (२)