श्री घंटाकर्ण को हिन्दू, बौध और जैन लोक हितकारी देवता के रूप में मानते है / श्री घंटाकर्ण को भैरव भी मन जाता है , कोणार्क सूर्य मंदिर के पत्थरों पर भी नाव में में नाचते हुए घंटाकर्ण भैरवों की प्रतिमा उत्कीर्ण है. एक प्रतिमा शांत भाव में है और एक रौद्र रूप में है. कामख्या आसाम में भी कामख्या मंदिर के नजदीक श्री घंटाकर्ण का मंदिर है. रविन्द्रनाथ टैगोर की एक कथा में श्री घंटाकर्ण का जिक्र है. दक्षिण भारत और गुजरात मे भी उनकी पूजा होती है , केरल मे कृष्ण लीलाओं मे उनकी कृष्ण से भेंट का निर्त्य नाटक मे वर्णन होता है. श्री घंटाकर्ण को यक्ष राज कुबेर का सेनापति भी माना जाता है. दक्ष प्रजापति के यज्ञ को जिन शिव गणों ने भंग किया था श्री घंटाकर्ण भी उनमे से एक थे.
श्री घंटाकर्ण की उत्पति के बारे में अनेक मत हैं / पुराणो के अनुसार देवासुर संग्राम में जब शिव पुत्र स्कंध यानि कार्तिकेय को तारक असुर का वध करने के लिए जब देव सेना का सेनापति बनाया तो ब्रह्मा ने उनकी रक्षा के लिए चार महासक्तिशाली वीरों की उत्पति की जिनकी गति वायु की तरह थी और वो अपनी शक्ति को अपनी इच्छा से बढ़ा घटा सकते थे . इनमे से घंटाकर्ण एक थे . अन्य बीरों के नाम , नान्दिसेन, लोहिताक्ष और कुमुदमलिन है. वीर शैव मत के अनुसार घंटाकर्ण परा शिव के पांच लौकिक अवतारों में से एक हैं जो हर युग में पृथ्वी पर अवतरित होते हैं और जो शैव परम्परा और ज्ञान को अक्षुण रखते हैं और इसका प्रसार करते हैं. इनके नाम रेणुका, दारुक, घंटाकर्ण , धेनुकर्ण और विस्वकर्ण हैं/ये परम शिव के पांच भावो सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान के प्रतिक हैं/ कलि -युग में ये रेवानासिद्धा मरुलासिद्धा एकोरमा , पंडितअराध्य और विस्वराध्य के नाम से अवतरित हुए और इन्होने लिंगायत संप्रदाय का प्रतिपादन किया / सतयुग में ये एकाक्षर शिवाचार्य , द्वीक्षर शिवाचार्य, त्रि क्षर , शिवाचार्य, चतुसक्षर शिवाचार्य और पञ्चक्षर शिवाचार्य के नाम से जाने गए/ इस प्रकार श्री घंटाकर्ण कलियुग में एकोरम आचार्य के रूप में भीमशंकर लिंग से उत्पन्न हुए और उन्होंने केदार पीठ के स्थापना की / इसी प्रकार अन्य आचार्य भी भिभिन्न लिंगो से प्रकट हुए
श्री घंटाकर्ण को महाबल नाम से भी जाना जाता है / लिंग पुराण के अनुसार १७ वे द्वापर युग में जब भगवान शिव ने गुहा वासी के रूप में अवतार लिया तो उनके उत्तथ्य, वामदेव, महायोग और महा बल नमक पुत्र हुए /जैन ग्रंथों में श्री घंटाकर्ण का नाम महाबल या तुंगभद्र बताया गया है जो रत्ना संचयी /मंग्लावती नगर के राजा थे जो बाद में अभिनन्दन नाथ के रूप में प्रसिद्ध हुए / जैन गाथाओं में उन्हें ५२ रक्षक बीरों में से ३० वें घंटाकर्ण महाबीर के रूप में पूजा जाता हैं. उनका महूदी, गुजरात में एक मंदिर है जो पूरे भारत में जैन समाज में प्रसिद्द हैं. उनका महूदी, गुजरात में एक मंदिर है जो पूरे भारत में जैन समाज में प्रसिद्द हैं. एक अन्य कथा में उन्हें श्री नगर श्री पर्वत का राजा बताया गया है. जैन साहित्य में घंटाकर्ण की पूजा का विशेष विधान है और विभिन्न उपचारों मरण, मोहन, उच्चाटन, लक्ष्मी प्राप्ति, रोगों से मुक्ति के लिए घंटाकर्ण जी के मन्त्र का जप का विधान है. बौध (महायान) मत के अनुसार महाबल अमिताभ के अवतार हैं और उत्तर पश्चिम दिशा के दिक्पाल हैं
हरिवंश पुराण में श्री घंटाकर्ण के बारे में कहा गया है की जब भगवान श्री कृष्ण पुत्र रत्न की कामना लेकर भगवान शिव की आराधना के बद्रिकाश्रम पधारे / एक दिन जब वह नदी किनारे भ्रमण कर रहे थे तो उन्हें खाओ खाओ , बचाओ बचाओ और मारो मारो का कोलाहल सुनाई दिया / वह आश्चर्यचकित रह गए की इस निर्जन वन में ब्राह्मणों और ऋषियों के आलावा और कौन हो सकता हैं. वह रुक कर एक जगह बैठ गए तभी उन्हें मिर्गों की एक टोली भागती हुए देखी दी, जिनका पीछा कुत्तों का एक झुण्ड कर रहा था और उनके पीछे गर्जना करते हुए असुरों का एक दल दिखाई देता है/ जिनके साथ बहेलिये भी दौड़ रहे थे / उन सबके पीछे विशालकाय और कुरूप देह वाले दो दानव थे / इन लोगों के नजर जब भगवन कृष्ण पर पड़ी तो उन्होंने भगवन श्रीकृष्ण से पुछा की वी कौन हैं और वहां किसलिए आवए हैं. भगवन श्रीकृष्ण ने खा कि मई वासुदेव कृष्ण हूँ और द्वारिका से भगवन शिव कि तपस्या के लिए आया हूं/ तब भगवान् श्रीकृष्ण ने बड़े दानव से पुछा कि वे कौन हैं हैं और हिरनों का शिकार क्यों कर रहे हैं. तब बड़े दानव ने उत्तर दिया कि वह कुबेर के अनुचर है और शिव के भक्त हैं / बिष्णु से घृणा के कारन उन्होंने कानो में घंटियाँ पहन रखी थी ताकि विष्णु का नाम उन्हे गलती से भी न सुनाई दे. उनकी भक्ति से खुस होकर भगवन शिव ने जब उन्होंने बर मागने को कहा तो घंटाकर्ण ने भगवान् शिव से मुक्ति कि याचना कि. इस पर भगवान् शिव ने कहा कि केवल विष्णु ही मुक्ति प्रदान कर सकते हैं अस्तु उन्हें भगवान् विष्णु कि पूजा करनी चाहिए और विष्णु को मिलने द्वारिका जाना चाहिए / सो वे विष्णु पूजा हेतु मिर्गों का आखेट कर रहे हैं / इसके पश्चात घंटाकर्ण और उनका भाई विष्णु के ध्यान में बैठ गए /उनके भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया / आँखे खोलने पर उन्होंने कृष्ण को उसी रूप में देखा जैसा उन्होंने ध्यान में देखा था वह अत्यंत प्रसन्न हुए और नाचने लगे उन्होंने कृष्ण कि प्रसंशा कि और उन्हें ब्राहमण का ताजा मांस भेंट किया / कृष्ण उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्होंने नम्रता से मांस कि भेंट लेने से मनI कर दिया / उन्होंने घंटाकर्ण और उनके भाई को दिव्य रूप प्रदान किया / घंटाकर्ण ने बार माँगा कि जो भी घंटाकर्ण कि विष्णु से भेंट के बारे में सोचेगा उसका मस्तिष्क और विचार शुद्ध हो जायेंगे / कहते हैं किस विष्णु ने बर दिया कि तुमने हिंसा कर्म छोड़ कर मुक्ति चाही है तो तुम्हे इन्द्र के बाद मेरा धाम प्राप्त होगा /
नेपाल में श्री घंटाकर्ण को बुरे दैत्य के रूप में याद किया जाता है पर वहां के बिद्वानो कि अनुसार जनश्रुति में दानव को ही घंटाकर्ण मIन लिया गया जबकि घंटाकर्ण तो स्वयम भगवान् कार्तिकेय थे जिन्होंने तारक असुर का बध किया .
थाय्य्म पूरा कथाओं के अनुसार भगवान् शिव कैलाश पर दो दिन तक लगातार तांडव कर रहे थे. जब वह विश्राम के लिए बैठे तो उन द्वारा उत्पन्न तीन भूत उनके सम्मुख खड़े हो गए- छोटा चिरुम्बा , बड़ा चिरुम्बा और धन्दन. वो तीनो मिलकर भगवन शिव के साथ शरारत करने लगे और उनसे उपहार की मांग करने लगे . भगवन शिव ने बिना सोचे उन्हें चेचक के बीज दे दिए. भूतों की खुसी का ठिकाना नहीं रहा और वो पृथ्वी पर उन बीजो को बिखेरने के लिए आतुर हो गए तभी उनके दिमाग में शक पैदा हुआ की यदि बीज अंकुरित नहीं हुए तो क्या होगा. अपना शक दूर करने के लिए उन्होंने कुछ बीज भगवान् शिव पर ही फ़ेंक दिए. जब तक भगवान् शिव उन बीजों को अपने से दूर करते उनका शरीर चेचक के दानो से भर गया. वेदना से भगवान् शिव लेट गए और सोचने लगे की अब उन्हें कौन बचाएगा / तभी उनके कंठ के भीतर से किसी ने उन्हें आवाज दी और एक पुरुष शिव के कान से प्रकट हुआ और उसने देखते ही देखते भयानक रूप धारण कर लिया/ उसके मुख पर हजारों सूर्यों का तेज था उनके हाथों , शरीर और कमर से तेज प्रकाश निकल रहा था और शिर पर भी अग्नि पुंज प्रस्फुटित हो रहा था. उनके एक हाथ में त्रिशूल और दुसरे में दंड शोभित हो रहा था और घंटनाद से समस्त विश्व कांप रहा था . भगवान् शिव ने उसे से कहा की पुत्र मुझे इस भयानक रोग से मुक्त करो. इस पर उसने अपने तप्त हाथों से भगवान् शिव का उपचार किया. अब भगवान् शिव महसूस किया की वो भूत पृथ्वी पर कितना आतंक मचा सकते हैं, अतः उन्होंने कन्थाकर्ण (घंटाकर्ण) को आज्ञा दी कि वह पृथ्वी पर जाएँ और चेचक का उपचार करें/ थाय्य्म गाथा से प्रकट होता है कि घंटाकर्ण चेचक का उपचार करने वाले देवता हैं. इस कि पुष्टि इस बात से भी होती है कि उत्तर भारत में शीतला माता को चेचक कि देवी माना जाता है, उनके साथ भी श्री घंटाकर्ण का जिक्र आता है. अतः श्री घंटाकर्ण चेचक का उपचार करने के लिए ही शीतला माता के साथ चलते हों जबकि शीतला माता को चेचक फैलाने वाली देवी कि मान्यता प्राप्त है. एक अन्य आख्यान में मंदोदरी द्वारा काली पर चेचेक के बीज फेंकने कारन काली को चेचक हो जाता है तब घंटाकर्ण भाई होने के कारन देवी का स्पर्श नहीं करते और काली के चहरे पर चेचक के दाग रह जाते हैं. अतः श्री घंटाकर्ण त्वचा रोगों को दूर करने वाले देवता हैं. जैन कथाओं में श्री घंटाकर्ण को नकारात्मक उर्जाओं व बाधाओं को दूर करने वाले देवता कि ख्याति प्राप्त है. शिव के प्रति श्री घंटाकर्ण की निष्ठा अटूट है. स्वामी विवेकानंद भी इस निष्ठा का जिक्र करते हैं. उनके अनुसार घंटाकर्ण शिव के अनन्य भक्त थे और वह किसी और देवता का नाम तक सुनना पसंद नहीं करते थे , इसलिए उन्होंने अपने कानो में घंटे धारण कर रखे थे. शिव उन्हें समझाना चाहते थे कि शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है. अतः वह हरी हर अर्थात आधे विष्णु और आधे शिव के रूप में श्री घंटाकर्ण के सामने प्रकट हुए. उस समय घंटाकर्ण उनके सामने अगर /धूप चढ़ा रहे थे. जब घंटाकर्ण ने देखा कि अगरबत्ती कि खुशबू विष्णु के नाक में जा रही है तो उन्होंने अपने उंगलिया उनके नथुनों में दाल दी ताकि खुशबू सिर्फ भगवान् शिव के नाक में जाए . उन्हें कहीं यक्ष माना जाता है, कहीं पिसाच और कहीं दानव भी कहा जाता है. शैव और वैष्णवों के मतभेद बहुत ही प्रखर रहे हैं. अतः हो सकता है वैष्णव द्वेष के कारन शिव भक्त घंटाकर्ण को दानव कहते हों. बाबा तुलसी दास ने भी भगवन शिव और भगवान् राम कि एक दुसरे में निष्ठा दिखा कर वैष्णवों और शिवो को नजदीक लाने का प्रयास किया है. घंटाकर्ण को भगवान् कृष्ण द्वारा मुक्ति प्रदान करने का आख्यान भी यही सन्देश देता है.
गढ़वाल में घंटाकर्ण को ऐश्वर्य और सुख सम्पत्ति को देने वाला महान शक्तिशाली और पर्चाधारी देवता माना जाता है. बदरीनाथ में घंटाकर्ण का मंदिर है तथा उसे देव दर्शनी ( देव देखनी) कहते हैं और बद्री नाथ कि पूजा से पहले श्री घंटाकर्ण कि पूजा का विधान है. हिमालय के अंग अंग में घंटाकर्ण प्रतिष्टित और पूजित हैं. / गढ़वाल में क्वीली , लोस्तु , पौड़ी , खिरशु, चीनी , बाली कंडरस्यूं , चोपड़ा कोट व दूधातोली सभी जगह घंटाकर्ण पूजे जाते हैं/ लोस्तु में तो श्री घंटाकर्ण कि जात्रा हर १२ वर्ष में कुम्भ कि तरह आयोजित कि जाती है.
रिसिकेश में बीर भद्र , घन डयाल में महाबल और बद्रीनाथ में मणिभद्र कि उपस्थिति भी इस पुरे छेत्र पर शिव और उनके गणों के अधिपत्य को साबित करती है. किन्तु जो लोक चार में घंटाकर्ण के बारे में गाथा चलती है वह इससे भिन्न है. जागरों में उन्हें पांडवो यानी अर्जुन (खाती) और सुबोध (सुभद्रा) का बेटा और नारायण (कृष्ण ) का भांजा कहा गया है. उन्हें अभिमन्यु माना जाता है. केवल चीनी पौड़ी में ही उन्हें बर्बरीक माना जाता है जो घटोत्कच और हिदम्बा के बेटे थे. याद रहे कि बर्बरीक राजस्थान में श्याम खाटू के नाम से ख्यात हैं. जनश्रुति के अनुसार अभिमन्यु घंटाकर्ण देवता के रूप से दिल्ली में प्रतिष्ठित थे. जब दिल्ली पर मुग़ल शासकों को हमले आरंभ हुए तो घंटाकर्ण रक्तपात से नफ़रत के कारन दिल्ली छोड़ कर घन डयाल क्वीली में आ बसे. ये बात हैरानी कि प्रतीत होती कि जो अभिमन्यु कौरवो कि एक अक्षौनी सेना को विदIर चूका हो वह रक्तपात से घबरा गया / पर जागरों में ' विष्णु कि आत्मा तेरी झीज डाँन लेगे' उस घंटाकर्ण का जिक्र करती है जो विष्णु के सानिध्य से बद्रिकाश्रम में पवित्र हो गए थे. वार्ताओं में आता है की श्री घंटाकर्ण हरिद्वार, ऋषि केश पहुंचे और वहां से भगत सजवान उन्हें अपने कंधे पर क्वीली की सबसे ऊंचे स्थान जहाँ पर वर्तमान मंदिर स्थित है , तक लाया.
घंडयाल के दिल्ली से क्वीली पहुचने की पूरी वार्ता जागरों में दी गयी है. किस प्रकार ऋषिकेश में भगत सजवान जो अपने अन्य साथियों के साथ सामान लेने वहां आया था से, घंडयाल की मुलाकात हुई. घंडयाल बूढ़े व्यक्ति के रूप में उनसे मिले और कहा की मै चलने फिरने मे असमर्थ हूँ, कोई मुझे अपने साथ ले चले. अन्य जवान लोंगों ने बूढ़े का परिहास किया , किन्तु भगत सजवान , जो खुद अधेड़ था, को उनपर दया आ गइ / और वह उन्हें कंधे पर अपने सामान के ऊपर बैठा कर चला / देखते ही देखते वह सब साथियों से तेज चलता हुआ आगे निकल गया और उसे अपना बोझ फूलों से भी हल्का महसूस होने लगा . कुज्नी पट्टी मे ढाई गला के पास उन्हें रात हो गयी/ वह विश्राम के लिए जगह खोजने लगे / तभी उन्हें एक छान दिखाई दी. वह छान शिबू चमोली ( कई जगह चमोला भी आता है) की थी. वे उससे रात्रि विश्राम के ले जगह मांगते हैं. पर शिबू अजनबियों को शक की नजर से देखता है और जगह देने से मना कर देता है.. वार्ता मे "जगा का नोऊ मै त्वई उठन नि दयोन. शिबू चमोली के व्यवहार से आहत घंडयाल और भगत सजवान किसी तरह रात काटते हैं.. सुबह जब वह क्वीली की सबसे ऊंची चोटि पर पहुँचते हैं तो सजवान से कहते हैं की मुझे यहीं पर छोड़ दे . सजवान असमंजस मे आ जाता है की इतना बूढ़ा व्यक्ति इस सुनसान जगह पर कैसे रहेगा . घंडयाल उसको कहते हैं की उन्हें कुछ नहीं होगा, सजवान को यकीन नहीं आता, इस पर घंडयाल उसे तीन दिन बाद वहां आकर मिलने को कहते हैं . तीन दिन बाद जब सजवान उस जगह पहुंचा तो उसे घंडयाल कहीं नहीं दिखाई दिए पर उसको एक लिंग दिखाई दिया . तब भगत सजवान को लगा की बूढ़ा व्यक्ति आलोकिक शक्तियों का मालिक है. उसने अपने बंधू बांधवों को इकठ्ठा किया / सबने घंडयाल को अपने इष्ट मान लिया / उधर शिबू चमोली की भैंस रोज ढाई गला से लिंग पर दूध चढाने घंडयाल पहुँचने लगी. एक दिन पीछा करते हुए शिबू घंडयाल पहुंचा ... " ओलाई कुलाड़ी फिर फिर ओल्यून्दो " जब अपनी भैंस को शिबू घंडयाल के लिंग पर दूध चारते देखता है तो गुस्से से पागल होकर वह एक वार भैंस पर करता है और कुल्हाड़ी का दूसरा वार लिंग पर करता है . आज भी घंडयाल के लिंग पर दरार ( तिड्वाल) साफ़ दिखाई देता है. हिन्दुओं मे खंडित लिंग या मूर्तियों की पूजा नहीं होती किन्तु घंटाकर्ण का यह लिंग अपवाद है . कहते हैं की इस लिंग के टुकड़े उत्तराखंड मे जहाँ जहाँ गए वहा पर भी घंडयाल की पूजा होती है. कहते हैं की चमोली लोग तब से ही घंडयाल की पूजा मे शामिल नहीं होते .
सजवान सज्जू या सहजू राजपूत के वंसज है जो , रIजा कनाकपाल के साथ दक्षिण से आये थे. पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्रा जाती भास्कर में लिखते हैं की कनक पाल ७०० इसवी में गढ़वाल में आये थे. इसी तरह क्वीली के बमन गाँव के बिजल्वानो जो घंटाकर्ण के पुजारी भी है को इस छेत्र में ११०० इसवी में आया हुआ बताते हैं. घंटाकर्ण की किरपा से सज्वानो ने बहुत तरक्की की . वह चार चार गढों के गढ़पति बने. उनके खांडे का सिक्का पुरे गढ़वाल मे चलता था अर्थात उनकी बीरता को लोहा पूरा छेत्र मानता था / इस प्रकार श्री घंटाकर्ण की पूजा इस छेत्र में लगभग इसी समय से चली आ रही है. किन्तु जैसा की हरिवंश पुराण में जिक्र आया है, उसके अधiर पर ये तय है की श्री घंटाकर्ण तो हजारों साल से इस छेत्र में विधमान थे किन्तु भगत सजवान के सामने वह कहीं बाद में प्रकट हुए. यह माना जाता हैं की श्री घंटाकर्ण पर्वी स्नान के लिए गंगा जी जाते थे. बहुत संभव है की जब वह ऋषिकेश पर्वी स्नान के लिए गए हों तो उनके मुलाकात भगत सजवान से हुई हो और वह उसकी परीक्षा के लिए बुजुर्ग बन गए हों और वह सजवान के साथ अपने छेत्र में आ गए हों.
श्री घंटाकर्ण सचमुच अपने इस्ट भगवान् आशुतोष शिव की ही तरह दयालु हैं / भक्त लोग जो भी मनौती मांगते हैं उन्हें श्री घंटाकर्ण पूर्ण करते है. उनकी पूजा खेत्रपाल या छेत्रपाल के रूप में भी होती है. शक्ति की तरह उनका वाहन भी शेर है. तथा धनुस बाण और गदा उनके आयुध हैं. भक्त लोग उनकी जात (जात्रा) में शामिल होते हैं. उन्हें आटे और गुड से बना रोट, फल और द्रव्य कि भेट दी जाती है. श्रीफल के भेट सर्वोत्तम मानी जाती है. हजारों वर्षों से वह हमारी चेतना मे बसे हैं और रहेंगे उनका निम्न मन्त्र सर्व रोगों की औसधी है
श्री घंटाकर्ण मूल मंत्र
ॐ घंटाकर्ण महावीर, सर्वव्याधि विनाशक ,
विस्फोटक भयम प्राप्तो रक्ष रक्ष महाबल १
यत्र त्वम् तिष्टते देव, लिखितोऽक्षर पंक्तिभी :
रोगास्तत्र पर्णश्यान्ती , वात पित कफोढ्भवा-२
तत्र राज भयं नास्ति, यान्ति कर्णे जपक्षयम ,
शाकिनी भूत बेताल, राक्षसा च प्रभवन्तिना -३
न अकाले मरणम तस्य न सर्पेंन द्स्यन्ते,
अग्निस्चौर भयम नास्ति , घंटाकर्णो नमोस्तुते -४
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं घंटाकर्णये ठ: ठ : ठ: स्वाहा
जय श्री घंटाकर्ण
श्री घंटाकर्ण की उत्पति के बारे में अनेक मत हैं / पुराणो के अनुसार देवासुर संग्राम में जब शिव पुत्र स्कंध यानि कार्तिकेय को तारक असुर का वध करने के लिए जब देव सेना का सेनापति बनाया तो ब्रह्मा ने उनकी रक्षा के लिए चार महासक्तिशाली वीरों की उत्पति की जिनकी गति वायु की तरह थी और वो अपनी शक्ति को अपनी इच्छा से बढ़ा घटा सकते थे . इनमे से घंटाकर्ण एक थे . अन्य बीरों के नाम , नान्दिसेन, लोहिताक्ष और कुमुदमलिन है. वीर शैव मत के अनुसार घंटाकर्ण परा शिव के पांच लौकिक अवतारों में से एक हैं जो हर युग में पृथ्वी पर अवतरित होते हैं और जो शैव परम्परा और ज्ञान को अक्षुण रखते हैं और इसका प्रसार करते हैं. इनके नाम रेणुका, दारुक, घंटाकर्ण , धेनुकर्ण और विस्वकर्ण हैं/ये परम शिव के पांच भावो सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान के प्रतिक हैं/ कलि -युग में ये रेवानासिद्धा मरुलासिद्धा एकोरमा , पंडितअराध्य और विस्वराध्य के नाम से अवतरित हुए और इन्होने लिंगायत संप्रदाय का प्रतिपादन किया / सतयुग में ये एकाक्षर शिवाचार्य , द्वीक्षर शिवाचार्य, त्रि क्षर , शिवाचार्य, चतुसक्षर शिवाचार्य और पञ्चक्षर शिवाचार्य के नाम से जाने गए/ इस प्रकार श्री घंटाकर्ण कलियुग में एकोरम आचार्य के रूप में भीमशंकर लिंग से उत्पन्न हुए और उन्होंने केदार पीठ के स्थापना की / इसी प्रकार अन्य आचार्य भी भिभिन्न लिंगो से प्रकट हुए
श्री घंटाकर्ण को महाबल नाम से भी जाना जाता है / लिंग पुराण के अनुसार १७ वे द्वापर युग में जब भगवान शिव ने गुहा वासी के रूप में अवतार लिया तो उनके उत्तथ्य, वामदेव, महायोग और महा बल नमक पुत्र हुए /जैन ग्रंथों में श्री घंटाकर्ण का नाम महाबल या तुंगभद्र बताया गया है जो रत्ना संचयी /मंग्लावती नगर के राजा थे जो बाद में अभिनन्दन नाथ के रूप में प्रसिद्ध हुए / जैन गाथाओं में उन्हें ५२ रक्षक बीरों में से ३० वें घंटाकर्ण महाबीर के रूप में पूजा जाता हैं. उनका महूदी, गुजरात में एक मंदिर है जो पूरे भारत में जैन समाज में प्रसिद्द हैं. उनका महूदी, गुजरात में एक मंदिर है जो पूरे भारत में जैन समाज में प्रसिद्द हैं. एक अन्य कथा में उन्हें श्री नगर श्री पर्वत का राजा बताया गया है. जैन साहित्य में घंटाकर्ण की पूजा का विशेष विधान है और विभिन्न उपचारों मरण, मोहन, उच्चाटन, लक्ष्मी प्राप्ति, रोगों से मुक्ति के लिए घंटाकर्ण जी के मन्त्र का जप का विधान है. बौध (महायान) मत के अनुसार महाबल अमिताभ के अवतार हैं और उत्तर पश्चिम दिशा के दिक्पाल हैं
हरिवंश पुराण में श्री घंटाकर्ण के बारे में कहा गया है की जब भगवान श्री कृष्ण पुत्र रत्न की कामना लेकर भगवान शिव की आराधना के बद्रिकाश्रम पधारे / एक दिन जब वह नदी किनारे भ्रमण कर रहे थे तो उन्हें खाओ खाओ , बचाओ बचाओ और मारो मारो का कोलाहल सुनाई दिया / वह आश्चर्यचकित रह गए की इस निर्जन वन में ब्राह्मणों और ऋषियों के आलावा और कौन हो सकता हैं. वह रुक कर एक जगह बैठ गए तभी उन्हें मिर्गों की एक टोली भागती हुए देखी दी, जिनका पीछा कुत्तों का एक झुण्ड कर रहा था और उनके पीछे गर्जना करते हुए असुरों का एक दल दिखाई देता है/ जिनके साथ बहेलिये भी दौड़ रहे थे / उन सबके पीछे विशालकाय और कुरूप देह वाले दो दानव थे / इन लोगों के नजर जब भगवन कृष्ण पर पड़ी तो उन्होंने भगवन श्रीकृष्ण से पुछा की वी कौन हैं और वहां किसलिए आवए हैं. भगवन श्रीकृष्ण ने खा कि मई वासुदेव कृष्ण हूँ और द्वारिका से भगवन शिव कि तपस्या के लिए आया हूं/ तब भगवान् श्रीकृष्ण ने बड़े दानव से पुछा कि वे कौन हैं हैं और हिरनों का शिकार क्यों कर रहे हैं. तब बड़े दानव ने उत्तर दिया कि वह कुबेर के अनुचर है और शिव के भक्त हैं / बिष्णु से घृणा के कारन उन्होंने कानो में घंटियाँ पहन रखी थी ताकि विष्णु का नाम उन्हे गलती से भी न सुनाई दे. उनकी भक्ति से खुस होकर भगवन शिव ने जब उन्होंने बर मागने को कहा तो घंटाकर्ण ने भगवान् शिव से मुक्ति कि याचना कि. इस पर भगवान् शिव ने कहा कि केवल विष्णु ही मुक्ति प्रदान कर सकते हैं अस्तु उन्हें भगवान् विष्णु कि पूजा करनी चाहिए और विष्णु को मिलने द्वारिका जाना चाहिए / सो वे विष्णु पूजा हेतु मिर्गों का आखेट कर रहे हैं / इसके पश्चात घंटाकर्ण और उनका भाई विष्णु के ध्यान में बैठ गए /उनके भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया / आँखे खोलने पर उन्होंने कृष्ण को उसी रूप में देखा जैसा उन्होंने ध्यान में देखा था वह अत्यंत प्रसन्न हुए और नाचने लगे उन्होंने कृष्ण कि प्रसंशा कि और उन्हें ब्राहमण का ताजा मांस भेंट किया / कृष्ण उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्होंने नम्रता से मांस कि भेंट लेने से मनI कर दिया / उन्होंने घंटाकर्ण और उनके भाई को दिव्य रूप प्रदान किया / घंटाकर्ण ने बार माँगा कि जो भी घंटाकर्ण कि विष्णु से भेंट के बारे में सोचेगा उसका मस्तिष्क और विचार शुद्ध हो जायेंगे / कहते हैं किस विष्णु ने बर दिया कि तुमने हिंसा कर्म छोड़ कर मुक्ति चाही है तो तुम्हे इन्द्र के बाद मेरा धाम प्राप्त होगा /
नेपाल में श्री घंटाकर्ण को बुरे दैत्य के रूप में याद किया जाता है पर वहां के बिद्वानो कि अनुसार जनश्रुति में दानव को ही घंटाकर्ण मIन लिया गया जबकि घंटाकर्ण तो स्वयम भगवान् कार्तिकेय थे जिन्होंने तारक असुर का बध किया .
थाय्य्म पूरा कथाओं के अनुसार भगवान् शिव कैलाश पर दो दिन तक लगातार तांडव कर रहे थे. जब वह विश्राम के लिए बैठे तो उन द्वारा उत्पन्न तीन भूत उनके सम्मुख खड़े हो गए- छोटा चिरुम्बा , बड़ा चिरुम्बा और धन्दन. वो तीनो मिलकर भगवन शिव के साथ शरारत करने लगे और उनसे उपहार की मांग करने लगे . भगवन शिव ने बिना सोचे उन्हें चेचक के बीज दे दिए. भूतों की खुसी का ठिकाना नहीं रहा और वो पृथ्वी पर उन बीजो को बिखेरने के लिए आतुर हो गए तभी उनके दिमाग में शक पैदा हुआ की यदि बीज अंकुरित नहीं हुए तो क्या होगा. अपना शक दूर करने के लिए उन्होंने कुछ बीज भगवान् शिव पर ही फ़ेंक दिए. जब तक भगवान् शिव उन बीजों को अपने से दूर करते उनका शरीर चेचक के दानो से भर गया. वेदना से भगवान् शिव लेट गए और सोचने लगे की अब उन्हें कौन बचाएगा / तभी उनके कंठ के भीतर से किसी ने उन्हें आवाज दी और एक पुरुष शिव के कान से प्रकट हुआ और उसने देखते ही देखते भयानक रूप धारण कर लिया/ उसके मुख पर हजारों सूर्यों का तेज था उनके हाथों , शरीर और कमर से तेज प्रकाश निकल रहा था और शिर पर भी अग्नि पुंज प्रस्फुटित हो रहा था. उनके एक हाथ में त्रिशूल और दुसरे में दंड शोभित हो रहा था और घंटनाद से समस्त विश्व कांप रहा था . भगवान् शिव ने उसे से कहा की पुत्र मुझे इस भयानक रोग से मुक्त करो. इस पर उसने अपने तप्त हाथों से भगवान् शिव का उपचार किया. अब भगवान् शिव महसूस किया की वो भूत पृथ्वी पर कितना आतंक मचा सकते हैं, अतः उन्होंने कन्थाकर्ण (घंटाकर्ण) को आज्ञा दी कि वह पृथ्वी पर जाएँ और चेचक का उपचार करें/ थाय्य्म गाथा से प्रकट होता है कि घंटाकर्ण चेचक का उपचार करने वाले देवता हैं. इस कि पुष्टि इस बात से भी होती है कि उत्तर भारत में शीतला माता को चेचक कि देवी माना जाता है, उनके साथ भी श्री घंटाकर्ण का जिक्र आता है. अतः श्री घंटाकर्ण चेचक का उपचार करने के लिए ही शीतला माता के साथ चलते हों जबकि शीतला माता को चेचक फैलाने वाली देवी कि मान्यता प्राप्त है. एक अन्य आख्यान में मंदोदरी द्वारा काली पर चेचेक के बीज फेंकने कारन काली को चेचक हो जाता है तब घंटाकर्ण भाई होने के कारन देवी का स्पर्श नहीं करते और काली के चहरे पर चेचक के दाग रह जाते हैं. अतः श्री घंटाकर्ण त्वचा रोगों को दूर करने वाले देवता हैं. जैन कथाओं में श्री घंटाकर्ण को नकारात्मक उर्जाओं व बाधाओं को दूर करने वाले देवता कि ख्याति प्राप्त है. शिव के प्रति श्री घंटाकर्ण की निष्ठा अटूट है. स्वामी विवेकानंद भी इस निष्ठा का जिक्र करते हैं. उनके अनुसार घंटाकर्ण शिव के अनन्य भक्त थे और वह किसी और देवता का नाम तक सुनना पसंद नहीं करते थे , इसलिए उन्होंने अपने कानो में घंटे धारण कर रखे थे. शिव उन्हें समझाना चाहते थे कि शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है. अतः वह हरी हर अर्थात आधे विष्णु और आधे शिव के रूप में श्री घंटाकर्ण के सामने प्रकट हुए. उस समय घंटाकर्ण उनके सामने अगर /धूप चढ़ा रहे थे. जब घंटाकर्ण ने देखा कि अगरबत्ती कि खुशबू विष्णु के नाक में जा रही है तो उन्होंने अपने उंगलिया उनके नथुनों में दाल दी ताकि खुशबू सिर्फ भगवान् शिव के नाक में जाए . उन्हें कहीं यक्ष माना जाता है, कहीं पिसाच और कहीं दानव भी कहा जाता है. शैव और वैष्णवों के मतभेद बहुत ही प्रखर रहे हैं. अतः हो सकता है वैष्णव द्वेष के कारन शिव भक्त घंटाकर्ण को दानव कहते हों. बाबा तुलसी दास ने भी भगवन शिव और भगवान् राम कि एक दुसरे में निष्ठा दिखा कर वैष्णवों और शिवो को नजदीक लाने का प्रयास किया है. घंटाकर्ण को भगवान् कृष्ण द्वारा मुक्ति प्रदान करने का आख्यान भी यही सन्देश देता है.
गढ़वाल में घंटाकर्ण को ऐश्वर्य और सुख सम्पत्ति को देने वाला महान शक्तिशाली और पर्चाधारी देवता माना जाता है. बदरीनाथ में घंटाकर्ण का मंदिर है तथा उसे देव दर्शनी ( देव देखनी) कहते हैं और बद्री नाथ कि पूजा से पहले श्री घंटाकर्ण कि पूजा का विधान है. हिमालय के अंग अंग में घंटाकर्ण प्रतिष्टित और पूजित हैं. / गढ़वाल में क्वीली , लोस्तु , पौड़ी , खिरशु, चीनी , बाली कंडरस्यूं , चोपड़ा कोट व दूधातोली सभी जगह घंटाकर्ण पूजे जाते हैं/ लोस्तु में तो श्री घंटाकर्ण कि जात्रा हर १२ वर्ष में कुम्भ कि तरह आयोजित कि जाती है.
रिसिकेश में बीर भद्र , घन डयाल में महाबल और बद्रीनाथ में मणिभद्र कि उपस्थिति भी इस पुरे छेत्र पर शिव और उनके गणों के अधिपत्य को साबित करती है. किन्तु जो लोक चार में घंटाकर्ण के बारे में गाथा चलती है वह इससे भिन्न है. जागरों में उन्हें पांडवो यानी अर्जुन (खाती) और सुबोध (सुभद्रा) का बेटा और नारायण (कृष्ण ) का भांजा कहा गया है. उन्हें अभिमन्यु माना जाता है. केवल चीनी पौड़ी में ही उन्हें बर्बरीक माना जाता है जो घटोत्कच और हिदम्बा के बेटे थे. याद रहे कि बर्बरीक राजस्थान में श्याम खाटू के नाम से ख्यात हैं. जनश्रुति के अनुसार अभिमन्यु घंटाकर्ण देवता के रूप से दिल्ली में प्रतिष्ठित थे. जब दिल्ली पर मुग़ल शासकों को हमले आरंभ हुए तो घंटाकर्ण रक्तपात से नफ़रत के कारन दिल्ली छोड़ कर घन डयाल क्वीली में आ बसे. ये बात हैरानी कि प्रतीत होती कि जो अभिमन्यु कौरवो कि एक अक्षौनी सेना को विदIर चूका हो वह रक्तपात से घबरा गया / पर जागरों में ' विष्णु कि आत्मा तेरी झीज डाँन लेगे' उस घंटाकर्ण का जिक्र करती है जो विष्णु के सानिध्य से बद्रिकाश्रम में पवित्र हो गए थे. वार्ताओं में आता है की श्री घंटाकर्ण हरिद्वार, ऋषि केश पहुंचे और वहां से भगत सजवान उन्हें अपने कंधे पर क्वीली की सबसे ऊंचे स्थान जहाँ पर वर्तमान मंदिर स्थित है , तक लाया.
घंडयाल के दिल्ली से क्वीली पहुचने की पूरी वार्ता जागरों में दी गयी है. किस प्रकार ऋषिकेश में भगत सजवान जो अपने अन्य साथियों के साथ सामान लेने वहां आया था से, घंडयाल की मुलाकात हुई. घंडयाल बूढ़े व्यक्ति के रूप में उनसे मिले और कहा की मै चलने फिरने मे असमर्थ हूँ, कोई मुझे अपने साथ ले चले. अन्य जवान लोंगों ने बूढ़े का परिहास किया , किन्तु भगत सजवान , जो खुद अधेड़ था, को उनपर दया आ गइ / और वह उन्हें कंधे पर अपने सामान के ऊपर बैठा कर चला / देखते ही देखते वह सब साथियों से तेज चलता हुआ आगे निकल गया और उसे अपना बोझ फूलों से भी हल्का महसूस होने लगा . कुज्नी पट्टी मे ढाई गला के पास उन्हें रात हो गयी/ वह विश्राम के लिए जगह खोजने लगे / तभी उन्हें एक छान दिखाई दी. वह छान शिबू चमोली ( कई जगह चमोला भी आता है) की थी. वे उससे रात्रि विश्राम के ले जगह मांगते हैं. पर शिबू अजनबियों को शक की नजर से देखता है और जगह देने से मना कर देता है.. वार्ता मे "जगा का नोऊ मै त्वई उठन नि दयोन. शिबू चमोली के व्यवहार से आहत घंडयाल और भगत सजवान किसी तरह रात काटते हैं.. सुबह जब वह क्वीली की सबसे ऊंची चोटि पर पहुँचते हैं तो सजवान से कहते हैं की मुझे यहीं पर छोड़ दे . सजवान असमंजस मे आ जाता है की इतना बूढ़ा व्यक्ति इस सुनसान जगह पर कैसे रहेगा . घंडयाल उसको कहते हैं की उन्हें कुछ नहीं होगा, सजवान को यकीन नहीं आता, इस पर घंडयाल उसे तीन दिन बाद वहां आकर मिलने को कहते हैं . तीन दिन बाद जब सजवान उस जगह पहुंचा तो उसे घंडयाल कहीं नहीं दिखाई दिए पर उसको एक लिंग दिखाई दिया . तब भगत सजवान को लगा की बूढ़ा व्यक्ति आलोकिक शक्तियों का मालिक है. उसने अपने बंधू बांधवों को इकठ्ठा किया / सबने घंडयाल को अपने इष्ट मान लिया / उधर शिबू चमोली की भैंस रोज ढाई गला से लिंग पर दूध चढाने घंडयाल पहुँचने लगी. एक दिन पीछा करते हुए शिबू घंडयाल पहुंचा ... " ओलाई कुलाड़ी फिर फिर ओल्यून्दो " जब अपनी भैंस को शिबू घंडयाल के लिंग पर दूध चारते देखता है तो गुस्से से पागल होकर वह एक वार भैंस पर करता है और कुल्हाड़ी का दूसरा वार लिंग पर करता है . आज भी घंडयाल के लिंग पर दरार ( तिड्वाल) साफ़ दिखाई देता है. हिन्दुओं मे खंडित लिंग या मूर्तियों की पूजा नहीं होती किन्तु घंटाकर्ण का यह लिंग अपवाद है . कहते हैं की इस लिंग के टुकड़े उत्तराखंड मे जहाँ जहाँ गए वहा पर भी घंडयाल की पूजा होती है. कहते हैं की चमोली लोग तब से ही घंडयाल की पूजा मे शामिल नहीं होते .
सजवान सज्जू या सहजू राजपूत के वंसज है जो , रIजा कनाकपाल के साथ दक्षिण से आये थे. पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्रा जाती भास्कर में लिखते हैं की कनक पाल ७०० इसवी में गढ़वाल में आये थे. इसी तरह क्वीली के बमन गाँव के बिजल्वानो जो घंटाकर्ण के पुजारी भी है को इस छेत्र में ११०० इसवी में आया हुआ बताते हैं. घंटाकर्ण की किरपा से सज्वानो ने बहुत तरक्की की . वह चार चार गढों के गढ़पति बने. उनके खांडे का सिक्का पुरे गढ़वाल मे चलता था अर्थात उनकी बीरता को लोहा पूरा छेत्र मानता था / इस प्रकार श्री घंटाकर्ण की पूजा इस छेत्र में लगभग इसी समय से चली आ रही है. किन्तु जैसा की हरिवंश पुराण में जिक्र आया है, उसके अधiर पर ये तय है की श्री घंटाकर्ण तो हजारों साल से इस छेत्र में विधमान थे किन्तु भगत सजवान के सामने वह कहीं बाद में प्रकट हुए. यह माना जाता हैं की श्री घंटाकर्ण पर्वी स्नान के लिए गंगा जी जाते थे. बहुत संभव है की जब वह ऋषिकेश पर्वी स्नान के लिए गए हों तो उनके मुलाकात भगत सजवान से हुई हो और वह उसकी परीक्षा के लिए बुजुर्ग बन गए हों और वह सजवान के साथ अपने छेत्र में आ गए हों.
श्री घंटाकर्ण सचमुच अपने इस्ट भगवान् आशुतोष शिव की ही तरह दयालु हैं / भक्त लोग जो भी मनौती मांगते हैं उन्हें श्री घंटाकर्ण पूर्ण करते है. उनकी पूजा खेत्रपाल या छेत्रपाल के रूप में भी होती है. शक्ति की तरह उनका वाहन भी शेर है. तथा धनुस बाण और गदा उनके आयुध हैं. भक्त लोग उनकी जात (जात्रा) में शामिल होते हैं. उन्हें आटे और गुड से बना रोट, फल और द्रव्य कि भेट दी जाती है. श्रीफल के भेट सर्वोत्तम मानी जाती है. हजारों वर्षों से वह हमारी चेतना मे बसे हैं और रहेंगे उनका निम्न मन्त्र सर्व रोगों की औसधी है
श्री घंटाकर्ण मूल मंत्र
ॐ घंटाकर्ण महावीर, सर्वव्याधि विनाशक ,
विस्फोटक भयम प्राप्तो रक्ष रक्ष महाबल १
यत्र त्वम् तिष्टते देव, लिखितोऽक्षर पंक्तिभी :
रोगास्तत्र पर्णश्यान्ती , वात पित कफोढ्भवा-२
तत्र राज भयं नास्ति, यान्ति कर्णे जपक्षयम ,
शाकिनी भूत बेताल, राक्षसा च प्रभवन्तिना -३
न अकाले मरणम तस्य न सर्पेंन द्स्यन्ते,
अग्निस्चौर भयम नास्ति , घंटाकर्णो नमोस्तुते -४
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं घंटाकर्णये ठ: ठ : ठ: स्वाहा
जय श्री घंटाकर्ण
घण्डियाल अथवा घंटाकर्ण देवता की उत्पति की बारे में विस्तृत जानकारी प्रस्तुति हेतु आभार आपका
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