श्री ओणेश्वर महादेव शिव स्वरूप हैं। इनकी उत्पत्ति पूर्वजों द्वारा बताई गई अनेक कथाओं के आधार पर पट्टी भदूरा के अन्तर्गत ग्राम ओनाल गांव के श्री बीरेन्द्र सिंह राणा द्वारा अपने अथक प्रयास से बहुत समय तक विभिन्न स्थानों पर जाकर विभिन्न प्रकार के बुर्जुग लोगों से पूर्व चर्चित लोक गाथाऐं के बारे में जानकारी प्राप्त कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जिसे लोगों उनके प्रयास को बहुत सराहनीय बताया। प्रकाशित पुस्तक का नाम "श्री ओणेश्वर महादेव मन्दिर देवल" है |
इस पुस्तक के आधार पर ओणेश्वर महादेव जी की उत्पत्ति कुज्जू सौड़ ओनालगांव के ऊपर मानी जाती है। ओनालगांव के निवासी अपने धन- पशुओं को उक्त स्थान पर घास-पत्ती हेतु चुगाने ले जाया करते थे। लोक मान्यता है कि अल्पायु में मृत्यु होने के कारण उक्त स्थान पर श्री ओणे’वर महादेव द्वारा ऐसी अलौकिक घटनायें की गई जिसमें गांव वालों की चुगने हेतु भेजी हुई गायों का सम्पूर्ण दूध पी जाना, स्थानीय लोगों को रात को स्वप्न में तरह-तरह की घटनाओं से सकार आदि अनेक उदाहरण आज भी सुनने को मिलते हैं।
जनपद टिहरी के सिरांई के सामने पट्टी रैका के हटवाल गांव के पास भागीरथी नदी उत्तरमुखी होकर बहती थी क्योंकि अब वह स्थान वर्तमान समय पर टिहरी बांध की झील में समा चुका है जहां पर भागीरथी उत्तरमुखी होकर बहती थी उस स्थान का नाम सूरज कुण्ड था। यहां पर स्नान करने का पुण्य हरिद्वारा या गंगोत्री के समान था, प्रतापनगर क्षेत्र के अतिरिक्त ठाण्डी, कमान्द एवं मणी, कुमराड़ा, की तरफ के देवी देवताओं के निशान एवं डोलियां परम्परागत रूप से मकर संक्रान्ति के दिन स्नान हेतु यहां आती थी, पुण्य अर्जित कर वापस अपने गन्तव्य को चले जाते थे। भदूरा पट्टी के ग्राम ओनाल गावं के लोग ओणेश्वर के निशान लेकर नहाने हेतु सूरज कुण्ड में स्नान करने के बाद सभी देवी देवता अपने निवास स्थान को चले गये। हमारे गांव के लोग जब देवता को ग्राम देवल से होकर निकल रहे थे तो क्षणिक विश्राम के लिए एक भेकल के पेड़ के नीचे बैठ गये और सभी श्रद्धालू-गण आराम करने लगे।
जिस स्थान व पेड़ का जिक्र हम कर रहे हैं पट्टी ओण के अन्तर्गत ग्राम देवल में बड़ा भारी पेड़ भेकल का था। भेकल अब लुप्त प्रायः हो गया है। कांटेदार पेड़ जिस पर हरे भरे फल जो पक कर नीले रंग के हो जाते हैं के नीचे रूके तथा विश्राम करने वाले श्रद्धालू अपने देवता के निशान को उठाने का प्रयास करते रहे किन्तु बहुत जोर अजमाईश के बाद देवता के निशान को नहीं उठा पाये थे। तत्प पश्चात् कुछ लोग भागे-भागे अपने गांव जाकर अपने बुर्जुगों को बताते हैं कि वहां पर देवता के निशान उठ नहीं रहे हैं। रात्रि को किसी वरिष्ट बुर्जुग को स्वप्न में साक्षात ओणेश्वर ने जटाधारी बालक के रूप में जिसकी सफेद मिरजई (एक विशेष प्रकार का लम्बा कुर्ता) पहने हुये स्वप्न में कहता है कि मैं अब उसी स्थान पर हमेशा के लिए रहूॅगा और मेरा अब निवास भेकल के पेड़ के नीचे ही रहेगा यह मेरा अन्तिम निर्णय है। बुर्जुग व्यक्ति ने सुबह उठकर सभी गांव वालों को इस बात से अवगत करवाया तथा सभी लोगों ने यह निर्णय लिया कि वहां पर ही देवता के द्वारा बताये गये स्थान पर देवता का पूजन किया जायेगा।
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